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बेंगलुरु/नई दिल्ली: कर्नाटक
की राजनीति में
आए दिन नए
मोड़ देखने को
मिलते हैं, लेकिन
इस बार मामला
बेहद गंभीर है।
राज्य में कांग्रेस
की सरकार को
बने हुए ढाई
साल होने को
आए हैं, और
इसी के साथ
वो बहुचर्चित 'ढाई
साल वाला फॉर्मूला' (2.5 Year Formula) का जिन्न
फिर से बोतल
से बाहर आ
गया है। खबर
है कि उपमुख्यमंत्री
और प्रदेश कांग्रेस
अध्यक्ष डीके शिवकुमार (DK Shivakumar) अब और
इंतज़ार करने
बीते
48 घंटों में बेंगलुरु
से लेकर दिल्ली
तक जो सियासी
हलचल हुई है,
उसने यह साफ
संकेत दे दिया
है कि कर्नाटक
कांग्रेस में "सब कुछ
ठीक नहीं है"। जहाँ
एक तरफ सिद्धारमैया
अपनी कुर्सी बचाने
के लिए किलेबंदी
कर रहे हैं,
वहीं डीके शिवकुमार
दिल्ली दरबार में अपनी
वफादारी का इनाम
मांग रहे हैं।
क्या है 'ढाई
साल' का सीक्रेट
समझौता?
राजनीतिक
गलियारों में यह
बात किसी से
छिपी नहीं है
कि मई 2023 में
जब कांग्रेस ने
कर्नाटक में बंपर
जीत दर्ज की
थी, तब मुख्यमंत्री
पद को लेकर
भारी रस्साकशी हुई
थी। उस वक्त
पार्टी हाईकमान ने सिद्धारमैया
और डीके शिवकुमार
के बीच एक
गुप्त समझौता कराया था।
सूत्रों
का दावा है
कि इस समझौते
के तहत पहले
ढाई साल सिद्धारमैया
को सीएम रहना
था और बाकी
के ढाई साल
डीके शिवकुमार को
कमान सौंपी जानी
थी। अब जैसे
ही यह समय
सीमा नजदीक आ
रही है, डीके
शिवकुमार के समर्थकों
ने "अबकी बार, डीके
सरकार" के नारे
लगाने शुरू कर
दिए हैं। उनका
कहना है कि
चुनाव जीतने में
डीके की मेहनत
और संसाधन सबसे
ज्यादा थे, इसलिए
अब वादा निभाने
का वक्त आ
गया है।
फ्लैशबैक: 2013 से चली
आ रही पुरानी
रंजिश
इन दोनों नेताओं के
बीच की अदावत
नई नहीं है।
2013 में जब कांग्रेस
सत्ता में आई
थी, तब भी
सिद्धारमैया सीएम बने
थे और उस
वक्त भी डीके
शिवकुमार को इंतज़ार
करना पड़ा था।
डीके शिवकुमार को
पार्टी का 'संकटमोचक' (Troubleshooter) माना जाता
है। चाहे विधायकों
को रिसॉर्ट में
सुरक्षित रखना हो
या चुनाव फंडिंग
का इंतजाम करना,
डीके हमेशा आगे
रहे हैं।
लेकिन
सिद्धारमैया का 'मास अपील' (Mass Appeal) और
उनकी साफ छवि
हमेशा उन पर
भारी पड़ जाती
है। सिद्धारमैया अहिंदा
(AHINDA - अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित)
वोट बैंक के
निर्विवाद नेता हैं,
जबकि डीके वोक्कालिगा
समुदाय से आते
हैं। यह लड़ाई
सिर्फ दो नेताओं
की नहीं, बल्कि
दो बड़े वोट
बैंकों की भी
है।
दिल्ली में 'आधी
रात' की मीटिंग
और डिनर डिप्लोमेसी
सबसे ज्यादा चर्चा डीके
शिवकुमार के अचानक
दिल्ली दौरे की
है। खबर है
कि उन्होंने कांग्रेस
अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल
गांधी से मुलाकात
कर साफ़ शब्दों
में कहा है
"वादा पूरा करो या
फैसला लो।" उनके तेवर
बता रहे हैं
कि इस बार
वे खाली हाथ
लौटने वाले नहीं
हैं।
उधर, बेंगलुरु में सिद्धारमैया
शांत नहीं बैठे
हैं। उन्होंने अपने
वफादार विधायकों को लामबंद
करना शुरू कर
दिया है। हाल
ही में एक
निजी होटल में
हुई 'डिनर डिप्लोमेसी'
ने आग में
घी डालने का
काम किया है,
जहाँ सिद्धारमैया गुट
के मंत्रियों ने
शक्ति प्रदर्शन किया।
सिद्धारमैया गुट का
तर्क है कि
लोकसभा चुनाव नजदीक नहीं
हैं, इसलिए सरकार
को स्थिर रखने
के लिए नेतृत्व
परिवर्तन नहीं होना
चाहिए।
विधायकों का गणित:
किसके पास कितनी
ताकत?
कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस के पास 135 विधायक हैं। लेकिन असली खेल अंदरूनी गुटबाजी का है:
- सिद्धारमैया गुट: दावा किया जाता है कि लगभग 70-80 विधायक सिद्धारमैया के साथ हैं। इनमें ज़्यादातर उत्तर कर्नाटक और ओबीसी समुदाय के विधायक ह
- डीके गुट: डीके शिवकुमार के पास 40-50 विधायकों का ठोस समर्थन है, लेकिन संगठन पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत है।
- तटस्थ: बाकी विधायक हवा का रुख देखकर पाला बदल सकते हैं।
हाईकमान
के लिए मुश्किल
यह है कि
अगर डीके को
सीएम नहीं बनाया,
तो वे संगठन
को कमजोर कर
सकते हैं, और
अगर सिद्धारमैया को
हटाया, तो सरकार
गिराने का खतरा
पैदा हो सकता
है।
जातीय समीकरण का पेंच
और भाजपा की
नज़र
कर्नाटक की राजनीति जाति के इर्द-गिर्द घूमती है।
- सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से आते हैं और उन्हें दलितों-मुस्लिमों का भी समर्थन प्राप्त है।
- डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय के कद्दावर नेता हैं, जो दक्षिण कर्नाटक में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
हाईकमान
के लिए किसी
एक को चुनना
मतलब दूसरे समुदाय
को नाराज करना
है। भाजपा इस
कलह पर मजे
ले रही है।
भाजपा नेताओं ने
तंज कसते हुए
कहा है कि
"यह सरकार अपने बोझ से
खुद गिर जाएगी।" सियासी
गलियारों में दबी
जुबान में 'ऑपरेशन
लोटस' (Operation
Lotus) की चर्चा भी शुरू
हो गई है।
अगर डीके शिवकुमार
की मांग पूरी
नहीं हुई, तो
क्या वे कोई
बड़ा कदम उठाएंगे?
यह सवाल सबके
मन में है।
विश्लेषण: हाईकमान के लिए 'सांप-छछूंदर' वाली हालत
'राजनीतिक
रिपोर्ट' का मानना
है कि कर्नाटक
कांग्रेस का यह
संकट हाईकमान की
सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा
है। महाराष्ट्र और
हरियाणा के चुनावों
के बाद कांग्रेस
नेतृत्व वैसे ही
दबाव में है।
ऐसे में क्या
वे सिद्धारमैया जैसे
कद्दावर नेता को
हटाने की हिम्मत
कर पाएंगे?
फिलहाल
कर्नाटक में 'सीजफायर'
जैसा माहौल है,
लेकिन यह शांति
किसी बड़े तूफ़ान
से पहले की
खामोशी लग रही
है। कुर्सी एक
है और दावेदार
दो ऐसे में
टकराव होना तय
है। आने वाले
कुछ हफ़्ते कर्नाटक
की राजनीति के
लिए बेहद अहम
होने वाले हैं।
निष्कर्ष
कर्नाटक का यह सियासी ड्रामा अब अपने क्लाइमेक्स पर पहुँच रहा है। क्या कांग्रेस आलाकमान अपने किए वादे को निभाएगा या फिर राजनीतिक मजबूरी के चलते डीके शिवकुमार को फिर से मायूस होना पड़ेगा? जनता और विपक्ष, दोनों की निगाहें दिल्ली और बेंगलुरु के बीच चल रहे इस शटल-कॉक खेल पर टिकी हैं।
डिस्क्लेमर: इस पोस्ट में इस्तेमाल की गई सभी तस्वीरें AI (Artificial Intelligence) द्वारा बनाई गई हैं और केवल प्रतीकात्मक (Representational) उद्देश्य के लिए हैं।

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