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नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट का वह किला, जिसे भेदना किसी भी विदेशी टीम के लिए नामुमकिन माना जाता था, अब अपनी ही गलतियों के बोझ तले ढह गया है। दक्षिण अफ्रीका ने भारत को उसी की सरजमीं पर टेस्ट सीरीज में हराकर यह साबित कर दिया है कि टीम इंडिया अब अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है।
इस शर्मनाक हार
के बाद अब
सारा गुस्सा मुख्य
कोच गौतम गंभीर (Gautam Gambhir) और मुख्य
चयनकर्ता अजीत अगरकर (Ajit Agarkar) पर फूट
रहा है। पिछले
एक साल से
टेस्ट क्रिकेट में
टीम का प्रदर्शन
बेहद 'औसत' (Average) रहा
है, लेकिन इस
सीरीज ने यह
साफ कर दिया
है कि समस्या
खिलाड़ियों की फॉर्म
में नहीं, बल्कि
'मैनेजमेंट की सोच' में
है।
क्या गंभीर और अगरकर
की जोड़ी भारतीय
क्रिकेट को रसातल
में ले जा
रही है? आइये
इस पर विस्तार
से चर्चा करते
हैं।
1. हर्षित राणा: 'प्रतिभा' या
'KKR कोटा'?
- इस हार के बाद सबसे बड़ा और तीखा सवाल टीम चयन पर उठ रहा है। गौतम गंभीर के कोच बनते ही युवा तेज गेंदबाज हर्षित राणा को लेकर एक अलग तरह की दीवानगी देखने को मिल रही है।
- बिना अनुभव के मौका: हर्षित राणा ने आईपीएल में अच्छा प्रदर्शन किया था (जहाँ गंभीर मेंटर थे), लेकिन क्या टी20 लीग का प्रदर्शन टेस्ट क्रिकेट का पैमाना हो सकता है? हर्षित के पास घरेलू रेड-बॉल क्रिकेट (रणजी ट्रॉफी) का अनुभव न के बराबर है। टेस्ट क्रिकेट में संयम और लंबे स्पेल डालने की क्षमता चाहिए होती है, जो रातों-रात नहीं आती।
- तीनों फॉर्मेट में जबरदस्ती एंट्री: उन्हें बिना किसी ठोस आधार के वनडे, टी20 और अब टेस्ट टीम में भी जगह दी जा रही है। दक्षिण अफ्रीका जैसी मजबूत टीम के खिलाफ, जहाँ अनुभव की जरूरत थी, वहां एक अनुभवहीन गेंदबाज पर दांव खेलना 'आत्मघाती' साबित हुआ।
- सवालों के घेरे में गंभीर: फैंस और एक्सपर्ट्स अब खुलेआम पूछ रहे हैं कि क्या यह चयन 'मेरिट' पर है या फिर गंभीर अपने आईपीएल के चहेते खिलाड़ियों (Favorites) को टीम इंडिया में सेट करने की कोशिश कर रहे हैं?
2. रणजी ट्रॉफी का अपमान:
घरेलू शेरों की
अनदेखी
अगरकर और गंभीर की जोड़ी ने भारतीय घरेलू क्रिकेट का सबसे बड़ा टूर्नामेंट रणजी ट्रॉफी को पूरी तरह अप्रासंगिक (Irrelevant) बना दिया है।
- ईशान किशन और गायकवाड़ की मेहनत बेकार: ईशान किशन, ऋतुराज गायकवाड़ और अभिमन्यु ईश्वरन जैसे खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट में रनों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है।
- संदेश क्या है? युवा खिलाड़ियों को यह संदेश जा रहा है कि "रणजी में पसीना बहाने से कुछ नहीं होगा, आईपीएल में दो अच्छे ओवर डालो और टीम इंडिया की कैप ले लो।" यह भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए बहुत खतरनाक ट्रेंड है।
3. ऑलराउंडर्स का मोह
और स्पेशलिस्ट गेंदबाजों
की बलि
अजीत अगरकर की अध्यक्षता वाली चयन समिति और गंभीर की रणनीति का एक और बड़ा फ्लॉप शो है टीम ऑलराउंडर्स से भर देना।
- बल्लेबाजी का लालच: टीम मैनेजमेंट को लगता है कि अगर हम 8वें और 9वें नंबर तक बल्लेबाजी रखेंगे, तो हम मैच जीत जाएंगे। इसी चक्कर में नितीश रेड्डी, वाशिंगटन सुंदर और अक्षर पटेल जैसे ऑलराउंडर्स को टीम में ठूंस दिया गया।
- गेंदबाजी की धार कुंद हुई: इसका सीधा नुकसान यह हुआ कि हमारे पास विकेट लेने वाले 'स्पेशलिस्ट गेंदबाज' (Specialist Bowlers) कम पड़ गए। टेस्ट मैच 20 विकेट लेने से जीता जाता है, न कि 9वें नंबर पर 20 रन बनाने से।
- दक्षिण अफ्रीका ने उठाया फायदा: दक्षिण अफ्रीका ने अपने स्पेशलिस्ट तेज गेंदबाजों और स्पिनरों पर भरोसा किया, जिन्होंने भारतीय बल्लेबाजों को टिकने नहीं दिया। वहीं, भारत अपने कामचलाऊ गेंदबाजों के भरोसे विकेट की उम्मीद करता रहा। जब दबाव बनाने की बारी आई, तो बुमराह को छोड़कर दूसरे छोर से रन बहते रहे।
4. पिछले एक साल
से गिरता ग्राफ
और 'एवरेज' प्रदर्शन
यह हार कोई अचानक हुई घटना नहीं है। अगर हम पिछले एक साल के टेस्ट प्रदर्शन पर नज़र डालें, तो टीम इंडिया का ग्राफ लगातार नीचे गिरा है।
- औसत प्रदर्शन: टीम इंडिया अब विरोधियों पर हावी होकर नहीं खेल रही, बल्कि संघर्ष करती दिख रही है। चाहे बल्लेबाजी हो या गेंदबाजी, वह 'किलर इंस्टिंक्ट' गायब है जो कभी कोहली-शास्त्री के दौर में इस टीम की पहचान थी।
- रणनीतिक दिवालियापन: गंभीर ने आते ही "फ्री हैंड" माँगा था और "आक्रामक क्रिकेट" की बात की थी। लेकिन असलियत यह है कि टीम 'कंफ्यूज' दिख रही है। पिचों को लेकर भी मैनेजमेंट की रणनीति (Rank Turners की मांग) टीम पर ही भारी पड़ रही है, क्योंकि हमारे अपने बल्लेबाज ही स्पिन के सामने नाच रहे हैं।
5. अगरकर की जवाबदेही
कौन तय करेगा?
कोच तो मैदान पर होता है, लेकिन चयनकर्ता पर्दे के पीछे। अजीत अगरकर के फैसलों में निरंतरता की भारी कमी है।
- कभी वे युवाओं को मौका देने की बात करते हैं, तो कभी अचानक पुराने खिलाड़ियों को याद करते हैं।
- हर्षित राणा जैसे फैसलों पर अगरकर की चुप्पी यह बताती है कि या तो वे गंभीर के दबाव में हैं या फिर उनका अपना कोई विजन नहीं है। एक मुख्य चयनकर्ता का काम कोच की 'हां में हां' मिलाना नहीं, बल्कि उसे सही टीम देना होता है।
निष्कर्ष: सुधार नहीं, सर्जरी
की जरूरत
- भारतीय क्रिकेट अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ सिर्फ 'मरहम-पट्टी' से काम नहीं चलेगा, अब 'सर्जरी' की जरूरत है।
- हर्षित राणा जैसे खिलाड़ियों को वापस घरेलू क्रिकेट में भेजकर तैयार होने का समय देना चाहिए।
- टेस्ट टीम में 5 प्रॉपर गेंदबाजों की थ्योरी पर लौटना होगा। ऑलराउंडर्स बोनस होते हैं, मुख्य हथियार नहीं।
- BCCI को गंभीर और अगरकर से कड़े सवाल पूछने होंगे।
अगर यह जोड़ी अपनी जिद्द और पक्षपातपूर्ण रवैये से बाज नहीं आई, तो भारतीय क्रिकेट को उस गर्त से निकलने में सालों लग जाएंगे जहाँ ये उसे धकेल रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका से मिली यह हार सिर्फ एक 'अलार्म' नहीं, बल्कि 'खतरे का सायरन' है।
डिस्क्लेमर: इस पोस्ट में इस्तेमाल की गई सभी तस्वीरें AI (Artificial Intelligence) द्वारा बनाई गई हैं और केवल प्रतीकात्मक (Representational) उद्देश्य के लिए हैं।

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