Bangladesh Hindu human rights crisis 2025, protest against political violence, Deepu Chandra Das murder and ISKCON controversy.
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ढाका बांग्लादेश के बारे में भारत के बौद्धिक वर्ग ने दशकों 
तक जो 'साझा संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता' का भ्रम फैलाया था, आज 2024-25 के घटनाक्रम ने उस दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद वहां जो अराजकता फैली, उसने यह साबित कर दिया है कि सत्ता परिवर्तन की आड़ में सबसे आसान शिकार वहां का अल्पसंख्यक हिंदू समाज ही होता है। मानवाधिकार संगठनों (HRW और Amnesty) की रिपोर्ट्स भी यह मानती हैं कि यह हिंसा केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसमें सांप्रदायिक नफरत का गहरा जहर भी घुला हुआ है। राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर कट्टरपंथी तत्व जिस तरह हावी हुए हैं, उससे वहां के हिंदुओं का जीवन भय और अनिश्चितता के साये में है।

भीड़तंत्र का खौफ और दीपू चंद्र दास की हत्या हाल ही में हुई घटनाएं बताती हैं कि कैसे 'ईशनिंदा' (Blasphemy) के आरोपों को हथियार बनाकर निजी और कार्यस्थल के विवादों को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। इसका सबसे भयावह उदाहरण दीपू चंद्र दास की हत्या है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दीपू पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया जो बाद में एक कार्यस्थल (Workplace) विवाद से जुड़ा मामला प्रतीत हुआ लेकिन भीड़ ने कानून का इंतजार नहीं किया। उन्मादी भीड़ ने उसे घेरकर जिंदा जला दिया। हालांकि, अंतरिम सरकार ने इस घटना की निंदा की और 10 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार भी किया, लेकिन सवाल यह है कि समाज में इतनी नफरत आई कहां से कि बिना जांच के किसी को जिंदा फूंक दिया जाए? यह घटना दिखाती है कि प्रशासन भले ही कार्रवाई का दावा करे, लेकिन जमीन पर 'मॉब जस्टिस' (भीड़ का न्याय) हावी है।

पुलिस थानों में भी असुरक्षा: उत्सव मंडल का मामला हिंसा का स्तर इतना गिर चुका है कि पुलिस थाने भी अब सुरक्षित नहीं रहे। खुलना में उत्सव मंडल नाम के युवक को ईशनिंदा के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया था। कायदे से उसे सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, लेकिन कट्टरपंथी भीड़ थाने के अंदर घुस गई और पुलिस की मौजूदगी में उसे बेरहमी से पीटा। उत्सव मंडल की जान तो बच गई, लेकिन उसे अधमरा कर दिया गया। यह घटना वहां की कानून व्यवस्था की लाचारी को दर्शाती है। जब रक्षक ही बेबस हो जाएं, तो अल्पसंख्यक समाज अपनी सुरक्षा की उम्मीद किससे करे?

चिन्मय कृष्ण दास और इस्कॉन पर निशाना 2024 में इस्कॉन के पूर्व पदाधिकारी चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया। उन पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान और राजद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगाए गए, जबकि वे हिंदू समुदाय के अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। हालांकि, बाद में कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें राहत (Bail) की उम्मीद बनी, लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद जिस तरह सड़कों पर इस्कॉन और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़की, वह चिंताजनक थी। यह दर्शाता है कि हिंदू नेतृत्व को दबाने के लिए प्रशासन और कट्टरपंथी तत्व किस तरह एक साथ सक्रिय हो जाते हैं।

यूनुस सरकार: मूक समर्थन या प्रशासनिक नाकामी? मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। इसे पूरी तरह 'राज्य प्रायोजित हिंसा' कहना शायद अतिशयोक्ति होगी, क्योंकि सरकार ने कई मौकों पर बयानों के जरिए निंदा की है और कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। लेकिन यह भी सच है कि जमात--इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी संगठनों का प्रभाव इस दौर में बढ़ा है। सरकार उपद्रवियों पर वह सख्ती नहीं दिखा पाई जिसकी जरूरत थी। इसे 'मूक समर्थन' भी कहें, तो यह 'प्रशासनिक नाकामी' जरूर है। जब हिंदुओं के घर जलाए जा रहे थे, तब सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया बेहद सुस्त थी, जिससे उपद्रवियों के हौसले बुलंद हुए।

जनसांख्यिकी और पलायन: एक धीमा जहर बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी का घटना (1971 के 22% से घटकर अब 8% के करीब) रातों-रात हुआ कोई चमत्कार नहीं है। यह पलायन, भेदभाव, असुरक्षा और 'शत्रु संपत्ति कानून' जैसे हथकंडों का नतीजा है। यह कोई घोषित 'धार्मिक युद्ध' नहीं हो सकता, लेकिन जिस तरह से हिंदुओं को हाशिए पर धकेला जा रहा है, वह उनके अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी है। डर के कारण वहां से हो रहा 'साइलेंट माइग्रेशन' (चुपचाप पलायन) किसी नरसंहार से कम नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दोहरा रवैया संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने बांग्लादेश के हालात पर चिंता जताई है और जांच की मांग की है, लेकिन पश्चिमी मीडिया और दुनिया के ताकतवर देशों की प्रतिक्रिया वैसी नहीं है जैसी गाजा या यूक्रेन के मामले में दिखती है। यह 'सिलेक्टिव आउटरेज' (चुनिंदा आक्रोश) ही है जो अपराधियों को बल देता है।

निष्कर्ष भारत के लिए यह समझना जरूरी है कि बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह सिर्फ राजनीतिक उथल-पुथल नहीं है। हसीना सरकार के गिरने के बाद वहां का हिंदू समाज 'सॉफ्ट टारगेट' बन गया है। दीपू चंद्र दास की राख और उत्सव मंडल के जख्म यह गवाही दे रहे हैं कि वहां हिंदू होना आज भी एक अपराध जैसा बन गया है। भारत सरकार को कूटनीतिक स्तर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि बांग्लादेश की सरकार चाहे वह कोई भी हो अपने अल्पसंख्यक नागरिकों की सुरक्षा की पूरी गारंटी ले। अत्याचार चाहे राजनीतिक बदले की भावना से हो या धार्मिक नफरत से, लहू आखिरकार निर्दोष हिंदुओं का ही बह रहा है।

 

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डिस्क्लेमर: इस पोस्ट में इस्तेमाल की गई सभी तस्वीरें AI (Artificial Intelligence) द्वारा बनाई गई हैं और केवल प्रतीकात्मक (Representational) उद्देश्य के लिए हैं।